आज दिवाली है.. रौशनी का, रौनक का, मिठाइयों का, अपनेपन और रिश्तों का त्यौहार...
हवा में कुछ अजब सी बात है... त्यौहार की तैयारियों में कुछ जादू सरीखी ख़ुशी है.. कुछ हलकी सी ठंड की शुरुआत है जो इस त्यौहार के मौसम की खासियत है।
सुबह से ही घर सजाने की होड़ से है.. लड़ियाँ लगाना, रंगोली बन रही है, खील और खिलोने देख के अंदर का बच्चा फिर से रंग बिरंगे हाथी या घोडा लेने की ज़िद करना चाहता है। मम्मी उधर पकवान बनाने की तैयारी में लगी हैं।
दूर किसी महानगर में रहते हुए ऐसा लगता है की समय बेहिसाब भाग रहा है और त्यौहार सिर्फ Whatsapp status तक ही सीमित रह गए हैं। लेकिन त्योहारों के समय में घर आके ज़िन्दगी का वो कुछ दिनों का ठहराव महसून करके लगता है कि शुक्र है हम अभी भी इंसान ही हैं मशीन नहीं बने पूरी तरह।
बचपन के वो सारे पल फिर से जीवंत उठे हैं त्योहारों के समय।
अपने घर से ही नहीं बल्कि अपने मोहल्ले के हर घर में कहीं हमारे बचपन का एक हिस्सा छुपा होता है।
पड़ोस में जाके अंकल-आंटी को दिवाली की बधाई दी, और उनके यहाँ मिठाई खाते हुए... उनके घर को निहारते हुए... अपने बचपन के वो पल जीवंत हो गए जब मम्मी-पापा के पीछे भागते हुए उनके यहाँ आ जाते थे और अपनी पसंदीदा मिठाई बिना किसी संकोच के झट से बताते और खाते थे। अब तो बस मिठाई के नाम पे calories का तर्क सुनाई देता है तब तो सिर्फ मिठाई और स्वाद का रिश्ता ही समझ आता था।
अपने शहर से एक अजीब सा कभी न मिटने वाला एक रिश्ता होता है। हर जगह से कुछ यादें जुडी होती हैं। स्कूल ले जाने वाली सड़क कहती है कि तुमने तो फिर पीछे मुड़के ही नहीं देखा। कुछ पेड़ बहुत पुराने दिखते हैं जो बूढ़े ज़रूर हो गए हैं लेकिन हमारे बचपन के किस्से-कहानियाँ समेटे हुए झुके से खड़े हैं और मानो बिना शब्दों के वही कहानियाँ सुना रहे हैं।
हर रास्ता किसी न किसी दोस्त के घर के पास से गुजरने वाला रास्ता है।
ये शहर अब भी अपना ठहराव, अपनी सादगी लिए वैसे ही है।
यहाँ किसी को भागने की जल्दी नहीं। मिलना-जुलना, बातें करना, सुख-दुःख साझा करना, पूरी तरह अपनी पहचान कभी न बदलना शायद यही एक छोटे शहर की खासियत होती है।
-- ज्योत्सना
हवा में कुछ अजब सी बात है... त्यौहार की तैयारियों में कुछ जादू सरीखी ख़ुशी है.. कुछ हलकी सी ठंड की शुरुआत है जो इस त्यौहार के मौसम की खासियत है।
सुबह से ही घर सजाने की होड़ से है.. लड़ियाँ लगाना, रंगोली बन रही है, खील और खिलोने देख के अंदर का बच्चा फिर से रंग बिरंगे हाथी या घोडा लेने की ज़िद करना चाहता है। मम्मी उधर पकवान बनाने की तैयारी में लगी हैं।
दूर किसी महानगर में रहते हुए ऐसा लगता है की समय बेहिसाब भाग रहा है और त्यौहार सिर्फ Whatsapp status तक ही सीमित रह गए हैं। लेकिन त्योहारों के समय में घर आके ज़िन्दगी का वो कुछ दिनों का ठहराव महसून करके लगता है कि शुक्र है हम अभी भी इंसान ही हैं मशीन नहीं बने पूरी तरह।
बचपन के वो सारे पल फिर से जीवंत उठे हैं त्योहारों के समय।
अपने घर से ही नहीं बल्कि अपने मोहल्ले के हर घर में कहीं हमारे बचपन का एक हिस्सा छुपा होता है।
पड़ोस में जाके अंकल-आंटी को दिवाली की बधाई दी, और उनके यहाँ मिठाई खाते हुए... उनके घर को निहारते हुए... अपने बचपन के वो पल जीवंत हो गए जब मम्मी-पापा के पीछे भागते हुए उनके यहाँ आ जाते थे और अपनी पसंदीदा मिठाई बिना किसी संकोच के झट से बताते और खाते थे। अब तो बस मिठाई के नाम पे calories का तर्क सुनाई देता है तब तो सिर्फ मिठाई और स्वाद का रिश्ता ही समझ आता था।
अपने शहर से एक अजीब सा कभी न मिटने वाला एक रिश्ता होता है। हर जगह से कुछ यादें जुडी होती हैं। स्कूल ले जाने वाली सड़क कहती है कि तुमने तो फिर पीछे मुड़के ही नहीं देखा। कुछ पेड़ बहुत पुराने दिखते हैं जो बूढ़े ज़रूर हो गए हैं लेकिन हमारे बचपन के किस्से-कहानियाँ समेटे हुए झुके से खड़े हैं और मानो बिना शब्दों के वही कहानियाँ सुना रहे हैं।
हर रास्ता किसी न किसी दोस्त के घर के पास से गुजरने वाला रास्ता है।
ये शहर अब भी अपना ठहराव, अपनी सादगी लिए वैसे ही है।
यहाँ किसी को भागने की जल्दी नहीं। मिलना-जुलना, बातें करना, सुख-दुःख साझा करना, पूरी तरह अपनी पहचान कभी न बदलना शायद यही एक छोटे शहर की खासियत होती है।
-- ज्योत्सना
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