Monday, April 8, 2019

वक़्त और मैं....

आज ज़रा वक़्त से मुलाकात हुई मेरी। सच में बहुत वक़्त लगा इस वक़्त ने मुझसे मिलने में। ऐसा कोई करता है भला? फिर मैंने भी थोड़ा गुस्सा तो दिखाया ही ना, शिकायतों का बक्सा भी मैंने खोला जिसमे कुछ खट्टी मीठी कुछ उलझी कुछ सुलझी बेकरारी हाथ लगी। ऐसे नज़रे चुरा रही थी जैसे कुछ चुरा के भागने ही वाली थी वहां से! खैर! फिर वक़्त ने ज़रा मनाया मुझे तो मैंने भी देर ना लगाई, और तैयार हो गई कुछ नए पुराने लम्हों से सजकर। अरे भाई अब date पे जाना है ना। जैसे ही बैग उठाया तो सौंधी सी खुशबु ने गले लगा लिया.. उफ्फ ये बरसात भी ना बिन बुलाए मेहमान सी है.. पर आज सही मौके पे आई है। अब? ये बरसात ये वक़्त और मैं कुछ लम्हों को चुरा लेंगे फिर। कुछ देर हमने बातें की खूब सारी और फिर आंख लग गई।
कुछ देर बाद आंख खुली हड़बड़ाहट में कि कहीं वक़्त चला तो नहीं गया छोड़कर.. पर वहीं था पास मेरे करवट बदल रहा था.. और बारिश अंगड़ाई ले रही थी अपनी नींद से जददोजहद कर रही थी.. जैसे तैसे उठी और फिर बरसने लगी। मैं kitchen की तरफ गई सोचा चाय बनाऊं। चाय के बर्तनों को ढूंढते हुए मैं अपना सुकून भी ढूंढ रही थी, वक़्त की जैसी ही नींद टूटी उसने सुकून थमाया मुझे और कहा इस बार संभाल कर रखना।
चाय की चुस्की भरते हुए बरसात ने फरमाइश करी कि कुछ ग़ज़ल या गानों का नाश्ता हो जाता तो सुकून उसको भी मिल जाता। तो बस फिर लगाए गए कुछ गानों का ग़ज़लों का मज़ा मैंने भी लिया वक़्त के साथ। 
बरसात गिरती रही और वक़्त खर्च होता गया। शाम यूं बीत गई कि पता ही ना चला कि अंधेरा कबसे दरवाज़े पे दस्तक दे रहा था। डर तो लगा कि कहीं गुस्से में ना हो पर किसी तरह दरवाज़ा खोला पर ये जनाब तो अपनी मस्ती में हैं और हस के हमारी ग़ज़ल गा रहें हैं।




चलिए अब dinner की तैयारी कर लेती हूं फिर कभी मुलाकात होगी। 😊


- गुंजन

Saturday, November 10, 2018

बचपन वाली दिवाली !

आज दिवाली है.. रौशनी का, रौनक का, मिठाइयों का, अपनेपन और रिश्तों का त्यौहार... 

हवा में कुछ अजब सी बात है... त्यौहार की तैयारियों में कुछ जादू सरीखी ख़ुशी है.. कुछ हलकी सी ठंड की शुरुआत है जो इस त्यौहार के मौसम की खासियत है। 

सुबह से ही घर  सजाने की होड़ से है.. लड़ियाँ लगाना, रंगोली बन रही है, खील और खिलोने देख के अंदर का बच्चा फिर से रंग बिरंगे हाथी या घोडा लेने की ज़िद करना चाहता है।  मम्मी उधर पकवान बनाने की तैयारी में लगी हैं।  

दूर किसी महानगर में रहते हुए ऐसा लगता है की समय बेहिसाब भाग रहा है और त्यौहार सिर्फ Whatsapp status तक ही सीमित रह गए हैं।  लेकिन त्योहारों के समय में घर आके ज़िन्दगी का वो कुछ दिनों का ठहराव महसून करके लगता है कि शुक्र है हम अभी भी इंसान ही हैं मशीन नहीं बने पूरी तरह।  

बचपन के वो सारे पल फिर से जीवंत उठे हैं त्योहारों के समय।  

अपने घर से ही नहीं बल्कि अपने मोहल्ले के हर घर में कहीं हमारे बचपन का एक हिस्सा छुपा होता है।  

पड़ोस में जाके अंकल-आंटी को दिवाली की बधाई दी, और उनके यहाँ मिठाई खाते हुए... उनके घर को निहारते हुए... अपने बचपन के वो पल जीवंत हो गए जब मम्मी-पापा के पीछे भागते हुए उनके यहाँ आ जाते थे और अपनी पसंदीदा मिठाई बिना किसी संकोच के झट से बताते और खाते थे।  अब तो बस मिठाई के नाम पे calories का तर्क सुनाई देता है तब तो सिर्फ मिठाई और स्वाद का रिश्ता ही समझ आता था। 

अपने शहर से एक अजीब सा  कभी न मिटने वाला एक रिश्ता होता है।  हर जगह से कुछ यादें जुडी होती हैं।  स्कूल ले जाने वाली सड़क कहती है कि तुमने तो फिर पीछे मुड़के ही नहीं देखा। कुछ पेड़ बहुत पुराने दिखते हैं जो बूढ़े ज़रूर हो गए हैं लेकिन हमारे बचपन के किस्से-कहानियाँ समेटे हुए झुके से खड़े हैं और मानो बिना शब्दों के वही कहानियाँ सुना रहे हैं। 

हर रास्ता किसी न किसी दोस्त के घर के पास से गुजरने वाला रास्ता है। 

ये शहर अब भी अपना ठहराव, अपनी सादगी लिए वैसे ही है। 

यहाँ किसी को भागने की जल्दी नहीं। मिलना-जुलना, बातें करना, सुख-दुःख साझा करना, पूरी तरह अपनी पहचान कभी न बदलना शायद यही एक छोटे शहर की खासियत होती है। 


-- ज्योत्सना 

Tuesday, July 7, 2015

एक दिन का सफर


आज नींद खुली तो लगा शायद शाम हो गई, पर नहीं, सब तो यहीं बैठे हैं। खिड़की पर चिपके posters के बीच में से झाँका, तो पता चला बारिश हो रही है। कलाई देखी तो अभी दस मिनट ही हुए थे झपकी लगे। घड़ी की सुई की तरह चारों तरफ नज़रें घुमाई, किसी ने सोते हुए देख तो नहीं लिया; अरे देख भी लिया तो क्या हुआ, ये session ही इतना पकाऊ था, सब ही सो गए होंगे। 

आज पहला दिन था नई नौकरी मे। सच बताऊँ तो बहुत boring होता है। वही घिसे-पिटे rules, वही पुराने processes, वही फ़ालतू HR Policies.. जिनसे केवल कंपनी का ही फ़ायदा होते देखा है। खैर..जैसे तैसे वो session ख़तम हुआ और tea-break हुआ।हमने फिर चारों तरफ नज़र घुमाई, इस बार नींद की चोरी के लिए नहीं, सोचा शायद कोई tea-partner ही मिल जाये। Tea-partner, ये वो लोग होते हैं जो केवल चाय पीने के लिए दोस्त बनाये जाते हैं। ताकि नींद ,कड़कती चाय और गप्पे, दोनों क साथ भगाई जा सके। 

कोई काम का चहेरा नहीं दिखा। नये बच्चे बहुत ही खुश थे , पुरानो के कुछ दोस्त साथ थे, और कुछ मेरे जैसे अकेले थे, पर वो फ़ोन पर busy थे। अब जब कोई मिला नही तो फटाफट चाय निबटाई  और बैठे बैठे एक शेर बना दिया , फिर चिपका दिया अपने दोस्त 'अरसलान' को। आजकल ये Watsapp भी कमाल की चीज़ है , virtual दोस्त बहुत अच्छे बन जाते हैं। वैसे, उसे शेर सुनाने का भी एक कारण होता है , ये लड़का हमेशा तारीफ़ करता है , चाहे जितना बुरा शेर लिखा हो।

उसकी भेजी तालियों की गूंज से अब नींद तो खुल चुकी थी। थोड़ी देर हुई और पहले दिन की सारी ज़रूरी लिखा-पढ़ी के बाद, stage पर perform कर रहे HR ने हाथ हिला कर auditorium खाली करने का इशारा कर दिया। हम भी मुस्कुरा दिये, की शुकरन अब घर निकलने का time हुआ। School में छुट्टी होने पर जैसे सब भाग कर बस पकड़ते थे, हम भी कुछ ऎसे तीर की तरह निकल पड़े। पर ये क्या, अभी एक दरबान बैठा था रास्ता रोकने को।

शाम अब और भी काली हो गयी थी। सोचा, सुबह नखरे नही दिखाए होते तो छाता अब काम आ जाता। खैर, अब तो बारिश रुकने का ही इंतज़ार कर सकते थे। हमने फिर नज़रें घुमाई , हर कोई अब जाने की जल्दी में था। अब शायद थक गए थे सब, नकली हंसी का बोझ उठाते हुए। 

हमने सोच लिया था, बारिश रुके न रुके, अगले पांच मिनट और इंतज़ार करना है। ये धमकी पहुंचा दी हवा ने बादलों को, और शाम दिन में बदल गयी। निकल पड़े हम बोतल में पानी भरके। अब तो पैदल ही जायेंगे metro station तक, सुबह रिक्शे वाले ने ठग लिया था बारिश के नाम पर। आधे रास्ते चलने पर हम इतरा दिए, सारी गाड़ियां जाम में फंसी थीं। अच्छा हुआ नही किया रिक्शा। 

पर आज तो जैसे ख़ुशी रूठी थी हमसे। metro station की सीढ़ियों से लेकर एक किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी। हमने आगे जाकर दो बार confirm किया , ये लाइन metro station  में घुसने के लिए ही है या कहीं free में laptop तो नही बँट रहे। अब क्या करें? line में खड़े होते तो एक घंटे में metro पकड़ पाते। हम वहां से निकले दूसरी तरफ की सीढ़ियों का रास्ता ढूढ़ने। पर ये क्या! वो entrance तो एकदम खाली है। अब तो दिल नाचने लगा। सब खड़े लोगों को दबी मुस्कान दिए हम सड़क पार कर लिए, आराम से चढ़ लिए station पर। पहली फ़तेह। 

सामने बैग checking counter पर नीचे वाली लाइन continued थी। अब समझ में आ गया था, की तमीज़ जेब में रखकर और तेल कानो में डालकर घुसना पड़ेगा बस। उम्मीद तो थी, ये लड़की थोड़ी शरीफ सी लग रही है, कुछ नही कहेगी, पर वो तो बरस पड़ी। हम दोबारा मुस्कुरा दिए। बेचारी लाइन follow करके आई है, अब दूध में मक्खी नही सहेगी। हमारा तेल काम आया, और हम नाक की सीध में निकल लिए। सोचा, लड़कियां ज्यादा तेज़ हो चली हैं आजकल की, 'बोडाम' को बताना पड़ेगा। 

                                                                                                                             -- श्वेतिमा