आज नींद खुली तो लगा शायद शाम हो गई, पर नहीं, सब तो यहीं बैठे हैं। खिड़की पर चिपके posters के बीच में से झाँका, तो पता चला बारिश हो रही है। कलाई देखी तो अभी दस मिनट ही हुए थे झपकी लगे। घड़ी की सुई की तरह चारों तरफ नज़रें घुमाई, किसी ने सोते हुए देख तो नहीं लिया; अरे देख भी लिया तो क्या हुआ, ये session ही इतना पकाऊ था, सब ही सो गए होंगे।
आज पहला दिन था नई नौकरी मे। सच बताऊँ तो बहुत boring होता है। वही घिसे-पिटे rules, वही पुराने processes, वही फ़ालतू HR Policies.. जिनसे केवल कंपनी का ही फ़ायदा होते देखा है। खैर..जैसे तैसे वो session ख़तम हुआ और tea-break हुआ।हमने फिर चारों तरफ नज़र घुमाई, इस बार नींद की चोरी के लिए नहीं, सोचा शायद कोई tea-partner ही मिल जाये। Tea-partner, ये वो लोग होते हैं जो केवल चाय पीने के लिए दोस्त बनाये जाते हैं। ताकि नींद ,कड़कती चाय और गप्पे, दोनों क साथ भगाई जा सके।
कोई काम का चहेरा नहीं दिखा। नये बच्चे बहुत ही खुश थे , पुरानो के कुछ दोस्त साथ थे, और कुछ मेरे जैसे अकेले थे, पर वो फ़ोन पर busy थे। अब जब कोई मिला नही तो फटाफट चाय निबटाई और बैठे बैठे एक शेर बना दिया , फिर चिपका दिया अपने दोस्त 'अरसलान' को। आजकल ये Watsapp भी कमाल की चीज़ है , virtual दोस्त बहुत अच्छे बन जाते हैं। वैसे, उसे शेर सुनाने का भी एक कारण होता है , ये लड़का हमेशा तारीफ़ करता है , चाहे जितना बुरा शेर लिखा हो।
उसकी भेजी तालियों की गूंज से अब नींद तो खुल चुकी थी। थोड़ी देर हुई और पहले दिन की सारी ज़रूरी लिखा-पढ़ी के बाद, stage पर perform कर रहे HR ने हाथ हिला कर auditorium खाली करने का इशारा कर दिया। हम भी मुस्कुरा दिये, की शुकरन अब घर निकलने का time हुआ। School में छुट्टी होने पर जैसे सब भाग कर बस पकड़ते थे, हम भी कुछ ऎसे तीर की तरह निकल पड़े। पर ये क्या, अभी एक दरबान बैठा था रास्ता रोकने को।
शाम अब और भी काली हो गयी थी। सोचा, सुबह नखरे नही दिखाए होते तो छाता अब काम आ जाता। खैर, अब तो बारिश रुकने का ही इंतज़ार कर सकते थे। हमने फिर नज़रें घुमाई , हर कोई अब जाने की जल्दी में था। अब शायद थक गए थे सब, नकली हंसी का बोझ उठाते हुए।
हमने सोच लिया था, बारिश रुके न रुके, अगले पांच मिनट और इंतज़ार करना है। ये धमकी पहुंचा दी हवा ने बादलों को, और शाम दिन में बदल गयी। निकल पड़े हम बोतल में पानी भरके। अब तो पैदल ही जायेंगे metro station तक, सुबह रिक्शे वाले ने ठग लिया था बारिश के नाम पर। आधे रास्ते चलने पर हम इतरा दिए, सारी गाड़ियां जाम में फंसी थीं। अच्छा हुआ नही किया रिक्शा।
पर आज तो जैसे ख़ुशी रूठी थी हमसे। metro station की सीढ़ियों से लेकर एक किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी। हमने आगे जाकर दो बार confirm किया , ये लाइन metro station में घुसने के लिए ही है या कहीं free में laptop तो नही बँट रहे। अब क्या करें? line में खड़े होते तो एक घंटे में metro पकड़ पाते। हम वहां से निकले दूसरी तरफ की सीढ़ियों का रास्ता ढूढ़ने। पर ये क्या! वो entrance तो एकदम खाली है। अब तो दिल नाचने लगा। सब खड़े लोगों को दबी मुस्कान दिए हम सड़क पार कर लिए, आराम से चढ़ लिए station पर। पहली फ़तेह।
सामने बैग checking counter पर नीचे वाली लाइन continued थी। अब समझ में आ गया था, की तमीज़ जेब में रखकर और तेल कानो में डालकर घुसना पड़ेगा बस। उम्मीद तो थी, ये लड़की थोड़ी शरीफ सी लग रही है, कुछ नही कहेगी, पर वो तो बरस पड़ी। हम दोबारा मुस्कुरा दिए। बेचारी लाइन follow करके आई है, अब दूध में मक्खी नही सहेगी। हमारा तेल काम आया, और हम नाक की सीध में निकल लिए। सोचा, लड़कियां ज्यादा तेज़ हो चली हैं आजकल की, 'बोडाम' को बताना पड़ेगा।
-- श्वेतिमा